जागता झारखंड संवाददाता शिकारीपाड़ा (दुमका):
दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड क्षेत्र के ढाका, देबाडीह, खाड़ूकदमा, कोल्हाबदार, झुनकी, पिनारगाड़िया, चित्रागाड़िया, सरसडंगाल, पलासी तथा अन्य कई मुस्लिम गांवों में आज गुरुवार को ईद उल-अजहा (बकरीद) का पर्व शांतिपूर्ण माहौल में मनाया गया। स्थानीय मस्जिदों व ईदगाहों में बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर ईद की नमाज़ अदा की और एक-दूसरे को गले लगाकर ईद उल अजहा बकरीद की बधाई दी। इस्लामिक कैलेंडर के अंतिम महीने जिल-हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाए जाने वाले इस पर्व का मुख्य संदेश त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति पूर्ण विश्वास है। ईद-उल-अजहा का इतिहास इस्लामी परंपरा के अनुसार, ईद-उल-अजहा की कहानी हजरत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हजरत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) से जुड़ी है।
अल्लाह के आदेश पर हजरत इब्राहिम ने सपने में अपनी सबसे प्रिय चीज कुर्बान करने का हुक्म पाया। उनके लिए सबसे अजीज चीज उनके बेटे इस्माइल थे। पिता-पुत्र दोनों अल्लाह की मर्जी के आगे सर झुका चुके थे। जैसे ही इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) ने छुरी चलाई, अल्लाह ने उनके ईमान और समर्पण को स्वीकार कर लिया और इस्माइल (अलैहिस्सलाम) की जगह एक भेड़ (दुंबा) भेज दी। इसी की याद में मुसलमान हर साल अल्लाह की राह में हलाल जानवरों की कुर्बानी देते हैं, जिसे सुन्नत-ए-इब्राहिमी भी कहा जाता है।
ईद-उल-अजहा हमें सिखाता है कि स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई सोचना ही सच्ची इबादत है। इस दिन लोग एक-दूसरे को गले लगाकर “ईद मुबारक” कहते हैं, मिठाइयां और विशेष व्यंजन बांटे जाते हैं तथा खुशियां साझा की जाती हैं।



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