कटिहार रेल मंडल में ‘नंबर प्लेट खेल’! नियमों की खुली अनदेखी, जिम्मेदार मौन


विशेष संवाददाता, जागता झारखंड, कटिहार, बिहार:
कटिहार रेल मंडल इन दिनों नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही का एक ऐसा अखाड़ा बन चुका है, जहाँ सरकारी राजस्व और परिवहन कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मंडल के विभिन्न रेल विभागों में तैनात पदाधिकारियों की सेवा में लगे वाहनों को लेकर जो तथ्य सामने आए हैं, वे सीधे तौर पर रेल प्रशासन के दोहरे मापदंड को उजागर कर रहे हैं। नियमों के मुताबिक, किसी भी वाणिज्यिक या विभागीय कार्य में लगे वाहनों पर कमर्शियल नंबर प्लेट यानी पीली प्लेट का उपयोग अनिवार्य है, लेकिन यहाँ की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जानकारी के अनुसार, बिहार एवं झारखंड को छोड़कर दूसरे प्रदेशों की जो गाड़ियां कटिहार रेल मंडल में चल रही हैं, वे तो नियमों का पालन करते हुए विधिवत वाणिज्यिक नंबर प्लेट का इस्तेमाल कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर चल रहे बिहार और झारखंड नंबर के वाहन निजी नंबर प्लेट (सफेद प्लेट) के सहारे ही विभागीय कार्यों और पदाधिकारियों की सवारी में लगे हुए हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि प्रशासन का रवैया एक ही नियम को लेकर बाहरी और स्थानीय स्तर पर पूरी तरह से अलग-अलग है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन और पक्षपात की श्रेणी में आता है।

यह स्थिति कई चुभते हुए सवाल खड़े करती है कि क्या नियम सिर्फ बाहर से आने वाले वाहनों के लिए ही बनाए गए हैं? क्या स्थानीय स्तर पर तैनात विभागीय पदाधिकारियों की सुख-सुविधा के लिए नियमों को नजरअंदाज करने की खुली छूट दे दी गई है? सबसे बड़ा सवाल रेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठता है कि आखिर विभागीय पदाधिकारियों की जानकारी में होते हुए भी इन निजी वाहनों का परिचालन आधिकारिक कार्यों के लिए कैसे और किसके संरक्षण में किया जा रहा है। जब इस गंभीर अनियमितता पर निविदा धारक से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा। दूरभाष और मोबाइल के माध्यम से संपर्क करने की बार-बार कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझा, जो इस बात का संकेत है कि इस 'नंबर प्लेट खेल' की जड़ें काफी गहरी हैं।

रेल मंडल के जिम्मेदार अधिकारियों की इस मामले पर चुप्पी न केवल संदेह पैदा करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सब कुछ जानते हुए भी सोची-समझी रणनीति के तहत इसे अनदेखा किया जा रहा है। पहले भी इस मुद्दे को लेकर समाचार प्रकाशित हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद रेल मंडल के अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटना, कई तरह के संदेहास्पद सवालों को जन्म देता है। निजी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों का व्यावसायिक उपयोग न केवल टैक्स की चोरी है, बल्कि सुरक्षा मानकों के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। अब देखना यह होगा कि रेल मंडल के जिम्मेदार अधिकारी इस ‘नंबर प्लेट खेल’ और प्रशासन के इस दोहरे मापदंड पर कब तक चुप्पी साधे रहते हैं, या फिर नियमों को सख्ती से लागू कर व्यवस्था को दुरुस्त करने का साहस दिखाते हैं।

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