कानून ₹8,000 में पास! 24 घंटे में ₹16 लाख का खेल—पाकुड़ में वर्दी पर उठे गंभीर सवाल


जागता झारखंड :
बिशेष संवाददाता सुबल यदुवंशी की रिपोर्ट जागता झारखंड पाकुड़: पाकुड़ की सड़कों पर इन दिनों सिर्फ पत्थर लदे ट्रक ही नहीं दौड़ रहे, बल्कि कानून को खुलेआम ‘रेट लिस्ट’ पर बेचा जा रहा है। पाकुड़-धुलियान मुख्य सड़क पर मुफ्फसील थाने के ठीक बाहर और कासिला-कुसमाफाटक मेन रोड पर जो खेल चल रहा है, उसने प्रशासनिक ईमानदारी की चूलें हिला दी हैं।सबसे चौंकाने वाली बात इस पूरे सिंडिकेट के केंद्र में खुद मुफ्फसील थाना प्रभारी गौरव कुमार का नाम सामने आ रहा है। आरोप है कि उनकी छत्रछाया में यह ‘अवैध वसूली तंत्र’ दिन-रात बेखौफ चल रहा है, जहां कानून किताबों में नहीं, बल्कि कैश में लिखा जा रहा है।

हर ट्रिप ₹8,000—और कानून हो जाता है क्लियर”

सूत्रों के मुताबिक, फर्जी माइनिंग चालान के सहारे रोज करीब 200 ट्रिप पत्थर लदे ट्रक ‘पास’ कराए जा रहे हैं। हर ट्रिप पर ₹8,000 की वसूली—यानी दिनभर में करीब ₹16 लाख की अवैध कमाई।यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं, बल्कि ऐसा ‘सिस्टम’ बन चुका है जहां नियमों की चिता जल रही है और नोटों की आरती उतारी जा रही है।

कैमरे गवाह, फिर भी खेल जारी

इस पूरे रूट पर 4 चेकपोस्ट और CCTV कैमरे मौजूद हैं। आसपास की इमारतों में भी निगरानी की व्यवस्था है।फिर भी अगर यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है, तो सवाल सीधा है।अगर CCTV फुटेज और चालानों का मिलान हो जाए, तो सच्चाई सामने आने में वक्त नहीं लगेगा। लेकिन सवाल ये है—क्या कोई देखना भी चाहता है हर दिन लाखों, हर महीने करोड़ों का खेल रोज़ की वसूली: ₹16 लाख महीने का हिसाब: करीब ₹5 करोड़ यहां तो हालात ऐसे हैं कि ऊंट के मुंह में जीरा नहीं, पूरा खजाना ही निगला जा रहा है।


गौरव कुमार पर सीधा सवाल


मुफ्फसील थाना प्रभारी गौरव कुमार पर लग रहे आरोप सिर्फ लापरवाही के नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को ‘मैनेज’ करने के हैं। कानून के रखवाले पर ही अगर ‘रेट फिक्सिंग’ का आरोप लगे, तो फिर जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? वर्दी अगर खुद दलाली पर उतर आए, तो इंसाफ किस दरवाजे पर मिलेगा?


कांग्रेस का हमला—‘सिस्टम और सिंडिकेट साथ-साथ’


कांग्रेस जिला अध्यक्ष श्रीकुमार सरकार ने इस पूरे मामले पर तीखा हमला बोला। उन्होंने साफ कहा— इतना बड़ा खेल बिना मिलीभगत के संभव नहीं। यहां सिस्टम और सिंडिकेट एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।


उनका इशारा साफ था— चोर-चोर मौसेरे भाई” वाली स्थिति अब खुलकर सामने आ चुकी है।


सबसे बड़ा सवाल—कार्रवाई कब?


जब आरोप सामने हैं, आंकड़े सामने हैं, कैमरे मौजूद हैं— तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?


कहीं ऐसा तो नहीं कि चोर की दाढ़ी में तिनका” वाली कहावत यहां सच हो रही है?


अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर हैं क्या इस ‘खुली लूट’ पर लगाम लगेगी? या फिर सब कुछ ऐसे ही ‘सब चलता है’ के नाम पर चलता रहेगा?


क्योंकि यहां सवाल सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि कानून की साख और वर्दी की इज्जत का है।

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