पान की गुमटी के सामने रेलवे प्रशासन का डंडा बेअसर: अतिक्रमण पर मेहरबान!

प्रतिनिधि जागता झारखंड, कटिहार (बिहार):- रेलवे स्टेशन के सामने जीआरपी चौक के पास हाल ही में रेलवे प्रशासन द्वारा चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान इन दिनों क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अभियान ऐसा था कि देखते ही देखते वर्षों से जमी दुकानें हटा दी गईं, सड़कें चौड़ी हो गईं और राहगीरों ने भी राहत की सांस ली। रेलवे प्रशासन ने भी अपनी मुस्तैदी पर संतोष जताया, लेकिन इस पूरी कार्रवाई के बीच एक ऐसा 'अनोखा' दृश्य उभर कर सामने आया है जिसने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।हैरानी की बात यह है कि जहाँ प्रशासन का डंडा हर अवैध निर्माण पर पूरी सख्ती से चला, वहीं एक 'पान की गुमटी' के पास पहुँचते ही कानून की रफ्तार और तेवर दोनों ही मानो सुस्त पड़ गए। आस-पास की सारी दुकानें हटा दी गईं, लेकिन यह गुमटी आज भी अपनी जगह पर पूरी मजबूती के साथ खड़ी है। भले ही यह गुमटी बंद पड़ी हो, लेकिन इसकी अडिग मौजूदगी रेलवे प्रशासन के उस दावे की हवा निकाल रही है जिसमें कहा जाता है कि 'कानून सबके लिए बराबर है'। स्थानीय लोग अब चुटकी ले रहे हैं कि आखिर इस गुमटी में ऐसी कौन सी खूबी है कि रेलवे प्रशासन का दस्ता इसके सामने आकर 'मौन' हो गया?क्या यह गुमटी किसी 'विशिष्ट सूची' का हिस्सा है, या फिर इसके पीछे किसी रसूखदार का 'स्पेशल कनेक्शन' काम कर रहा है? रेलवे प्रशासन की इस 'चयनात्मक सख्ती' ने यह संकेत दे दिया है कि सरकारी कार्यवाही कभी-कभी अपनी सुविधा और संबंधों के अनुसार चलती है। जब बात रसूख की आती है, तो शायद नियमों की परिभाषा भी बदल जाती है। अब जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है कि क्या इस बंद गुमटी को हटाने के लिए किसी विशेष आदेश का इंतजार है, या फिर इसे 'अपवाद' मानकर छोड़ दिया गया है? फिलहाल तो यह गुमटी अपनी जगह पर जमी रहकर यह बता रही है कि सिस्टम की सक्रियता तभी दिखती है जब सामने कोई साधारण दुकानदार हो। अब देखना यह है कि रेलवे प्रशासन इस 'विशेष अतिक्रमण' पर अपना कर्तव्य निभाता है या इसे पक्षपात के एक जीवंत उदाहरण के रूप में यूँ ही खड़ा रहने देता है।

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