जागता झारखंड : तनवीर अहमद रांची सामाजिक कार्यकर्ता पिछले कुछ सालों से केंद्रीय बजट के साथ एक चिंताजनक पैटर्न उभरकर सामने आया है। बजट पेश होने के दिन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए थोड़ी-सी बढ़ी हुई राशि दिखाई जाती है। मीडिया इसे तुरंत “बढ़ोतरी” बताकर प्रचारित करता है। मगर कुछ ही समय बाद, संशोधित बजट में यही रकम चुपचाप कम कर दी जाती है। और इससे भी ज़्यादा गंभीर बात यह है कि जो राशि बचती है, उसका बड़ा हिस्सा अंततः खर्च ही नहीं होता।वर्तमान केंद्रीय बजट में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए 3,400 करोड़ रुपये तय किए गए हैं। पिछले वर्ष यह राशि 3,350 करोड़ रुपये थी। कागज़ पर देखें तो यह 50 करोड़ रुपये की वृद्धि है। स्वाभाविक है कि इसे “सबका साथ, सबका विकास” और “सबका विश्वास” जैसे नारों से जोड़कर दिखाया जाएगा।लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है कि बजट में कितनी बढ़ोतरी हुई, बल्कि यह है कि इस घोषित रकम का आगे क्या होता है। संसद से मंजूरी मिलने के बाद क्या यह पैसा वास्तव में उन समुदायों तक पहुंचता है, जिनके नाम पर इसे रखा गया है? जिन अल्पसंख्यक समुदायों की देश की आबादी में हिस्सेदारी लगभग 19.3 प्रतिशत है, उनके अनुभव बताते हैं कि ज़्यादातर मामलों में जवाब निराशाजनक ही रहा है।अगर बजट के आंकड़ों को गहराई से परखा जाए, तो स्थिति बिल्कुल अलग नज़र आती है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की कई महत्वपूर्ण योजनाएं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार से जुड़ी थीं, या तो पूरी तरह समाप्त कर दी गई हैं या फिर उन्हें इतना सीमित कर दिया गया है कि उनका कोई ठोस असर नहीं बचा।मौलाना आज़ाद मेडिकल सहायता योजना को बंद कर दिया गया। अल्पसंख्यक बालिकाओं की स्कूली पढ़ाई को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू की गई साइकिल योजना भी समाप्त हो गई। मौलाना आज़ाद एजुकेशन फाउंडेशन की गतिविधियों को पहले धीरे-धीरे कमजोर किया गया और फिर 2024 में इस संस्था को ही बंद कर दिया गया।इसके अलावा नई मंज़िल, USTTAD, अल्पसंख्यक महिला नेतृत्व विकास योजना, हमारी धरोहर जैसी योजनाएं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायता देने वाले कार्यक्रम भी खत्म कर दिए गए। ये वही योजनाएं थीं, जिनका हवाला देकर सरकार अल्पसंख्यक सशक्तिकरण की बात करती रही है।जो योजनाएं और संस्थान अब भी कागज़ों पर मौजूद हैं, उनकी हालत भी बेहतर नहीं है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम को इस वर्ष केवल 5 करोड़ रुपये मिले हैं, जिससे इसके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे हैं। विदेश में उच्च शिक्षा के लिए दिए जाने वाले शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी की योजना को पहले लगभग समाप्त कर दिया गया था। अब फिर से कुछ राशि दिखाई गई है, लेकिन पिछले अनुभव किसी भरोसे की गुंजाइश नहीं छोड़ते।इन तमाम फैसलों को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार यह मान चुकी है कि अल्पसंख्यकों को अब किसी विशेष सहायता की आवश्यकता नहीं है, या फिर यह राज्य की जिम्मेदारी से जानबूझकर पीछे हटने की नीति का हिस्सा है।
उच्च शिक्षा पर सीधा असर
अगर किसी एक क्षेत्र में सबसे गहरा प्रभाव दिखाई देता है, तो वह उच्च शिक्षा है। तकनीकी और पेशेवर शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक प्रगति का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। लेकिन यही अवसर अल्पसंख्यक छात्रों के लिए लगातार सीमित किए जा रहे हैं।
मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप इसका स्पष्ट उदाहरण है। पिछले वर्ष इस योजना के लिए 7.34 करोड़ रुपये का प्रावधान था। इस साल इसे घटाकर केवल 6 लाख रुपये कर दिया गया है। यह सामान्य कटौती नहीं, बल्कि योजना को समाप्त करने जैसा कदम है।
जबकि 2014–15 में इसी योजना के लिए 300 करोड़ रुपये से अधिक का बजट रखा जाता था और उसका पूरा उपयोग भी होता था। यह अंतर साफ़ बताता है कि मामला प्रशासनिक नहीं, बल्कि नीति से जुड़ा हुआ है।
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप: औपचारिक अस्तित्व, व्यावहारिक अंत
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप को 2022–23 से नए छात्रों के लिए बंद कर दिया गया। कहा गया था कि पहले से चयनित छात्रों को सहायता मिलती रहेगी। लेकिन ज़मीनी हालात बताते हैं कि कई छात्रों को भुगतान नहीं मिल रहा या बेहद देरी से मिल रहा है।यह फेलोशिप उन अल्पसंख्यक छात्रों के लिए एक अहम सहारा थी, जो आर्थिक मजबूरियों के कारण शोध कार्य नहीं कर पाते थे। आज उस उम्मीद की जगह अनिश्चितता ने ले ली है।
छात्रवृत्तियों का एक-सा भविष्य
प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियां, जो गरीब अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा की नींव थीं, उनके साथ भी यही व्यवहार किया गया। पहले बड़ी राशि घोषित की गई, फिर संशोधित बजट में उसे नाममात्र कर दिया गया, और अंत में खर्च लगभग शून्य रहा।मदरसा शिक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए इस वर्ष कोई बजट नहीं रखा गया है। पिछले वर्षों में भी केवल औपचारिक राशि दिखाई गई, जो कभी ज़मीन पर नहीं उतरी।
घोषणा से हकीकत तक
हर साल एक ही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
पहले बजट में बड़ी घोषणा होती है।
फिर संशोधित बजट में कटौती होती है।
और अंततः पैसा खर्च ही नहीं होता।
2023–24 में 3,097 करोड़ रुपये घोषित किए गए, लेकिन खर्च सिर्फ 154 करोड़ रुपये हुआ। 2024–25 में 3,183 करोड़ रुपये घोषित हुए, जबकि खर्च 715 करोड़ के आसपास सिमट गया।
अब 2026–27 के लिए 3,400 करोड़ रुपये का एलान किया गया है। सवाल वही पुराना है कि इसमें से कितना धन वास्तव में अल्पसंख्यक समुदायों तक पहुंचेगा।
अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय 2006 में इसलिए गठित किया गया था ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को बराबरी का अवसर मिल सके। आज योजनाओं की समाप्ति, बजट में कटौती और धन के उपयोग में कमी उस मूल उद्देश्य को खोखला करती दिखाई देती है।
जब देश में नफरत, भेदभाव और बहिष्कार का माहौल लगातार गहराता जा रहा हो, तब ऐसे बजटीय फैसले केवल प्रशासनिक नहीं रह जाते। वे सरकार की प्राथमिकताओं और सोच को भी उजागर करते हैं।
यही वजह है कि यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या बजट अब सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है। जैसा कि शायर कलीम आज़िज़ ने कहा था—
“दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग,
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो।”


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