डीसी के आदेश का धज्जियां उड़ाते हुए, महेशपुर और हिरणपुर प्रखंड के पत्थर माफिया धड़ल्ले से रात भर चला रहे है क्रेशर....



जगत झारखंड संवाददाता धीरेन साहा: महेशपुर और हिरणपुर प्रखंड क्षेत्र में अवैध पत्थर क्रेशरों का संचालन लगातार सवालों के घेरे में है। जिला प्रशासन द्वारा रात्रिकालीन संचालन पर साफ-साफ रोक लगाने के बावजूद ज़मीनी हकीकत इससे उलट नज़र आती है। रात के अंधेरे में क्रेशरों की मशीनें पूरी ताकत से चल रही हैं और प्रशासनिक तंत्र इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे हुए है।स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि रात होते ही कई क्रेशरों में पूरी क्षमता के साथ उत्पादन शुरू हो जाता है। तेज़ आवाज़, धूल का गुबार, लगातार होने वाला भारी गाड़ियों का आवागमन और पर्यावरण प्रदूषण स्थानीय लोगों के जीवन पर गंभीर असर डाल रहा है। महेशपुर के ग्रामीणों ने बताया कि रात के समय भारी वाहनों के आवागमन से सड़कें टूट रही हैं, घर कांपने लगते हैं और चैन की नींद हराम हो जाती है। ग्रामीणों ने कई बार इसकी जानकारी जिला प्रशासन को दी थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। क्रेशर संचालक अपनी मनमानी जारी रखे हुए हैं और नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक कार्रवाई सिर्फ कागजों में होती है, लेकिन धरातल पर नहीं। स्थानीय लोगों ने बताया कि रात के समय होने वाले अवैध संचालन में न तो कोई सुरक्षा मानक अपनाया जाता है और न ही प्रदूषण नियंत्रण विभाग के नियमों का पालन किया जाता है। महेशपुर प्रखंड के कुसुमडंगा, जियापानी, नारायणटोला, आमलागाछी, कालूपारा, शहरग्राम, भीमपुर और धावाडंगल ओहि हिरणपुर प्रखण के बस्तडीह और शिमलढाप मौजा में इसी तरह रात में अवैध क्रेशर गतिविधियां देखने को मिली हैं। ग्रामीणों ने बताया कि इन गांवों में रात के समय भारी वाहनों का एक नेटवर्क सक्रिय रहता है जो पत्थरों की ढुलाई करता है। अवैध संचालन के कारण पर्यावरण को गंभीर नुकसान हो रहा है। धूलकण हवा में फैल रहे हैं, जिसमें सिलिका और अन्य हानिकारक तत्व शामिल हैं जो फेफड़ों की बीमारी और सांस लेने में तकलीफ पैदा कर सकते हैं। कई लोग खांसी, दमा और आँखों में जलन जैसी समस्याओं से परेशान हैं महेशपुर और हिरणपुर प्रखंड में अवैध क्रेशर संचालन को लेकर पहले भी कई बार विवाद हुआ है। इसके बाद जिला प्रशासन ने स्पष्ट आदेश जारी किया था कि शाम ढलने के बाद यानी शाम के 6 बजे के बाद किसी भी परिस्थिति में क्रेशर संचालन नहीं होगा। लेकिन इन आदेशों का पालन ज़मीनी स्तर पर नहीं हो पाया। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि कई क्रेशर संचालक स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों से मिला-जुला कर काम करते हैं और इस वजह से कार्रवाई पर असर पड़ता है। ग्रामीणों ने बताया कि प्रशासन केवल कागज़ पर नोटिस जारी करता है, लेकिन असल कार्रवाई बहुत कम होती है। कई क्रेशर तो बिना पर्यावरण मंजूरी के ही लगातार चल रहे हैं। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जिला प्रशासन इच्छाशक्ति दिखाए तो 24 घंटे के भीतर अवैध संचालन रोका जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। कुछ ग्रामीणों ने बताया कि जब वे विरोध करते हैं तो उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों ने कहा कि शिकायत करने पर उनके खिलाफ फर्जी केस दर्ज किए जाने की धमकी दी जाती है। अवैध क्रेशरों के कारण न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क दुर्घटनाओं में भी इजाफा हो रहा है। रात के समय तेज़ रफ्तार से चलने वाले भारी वाहनों के कारण कई बार हादसे हो चुके हैं, जिनकी शिकायत दर्ज भी नहीं की जाती।

बच्चों व बुजुर्गों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। लगातार धूल और कंपन के कारण घरों की दीवारें तक दरक रही हैं। महेशपुर और हिरणपुर क्षेत्र में कई नदियों और जल स्रोतों पर भी खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि अवैध खनन और क्रशिंग के कारण मिट्टी का कटाव तेज़ हो गया है। इससे भूजल स्तर भी प्रभावित हो रहा है। स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र पूरी तरह प्रदूषण की चपेट में आ सकता है और खेती योग्य जमीन पर भी असर पड़ेगा। कई किसानों ने बताया कि उनके खेतों में गिरती धूल की वजह से फसल प्रभावित हो जाती है। फसल की बढ़त रुक जाती है और मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है।इसके अलावा रात के संचालन से होने वाली शोरगुल की वजह से पशुपालन पर भी असर पड़ रहा है। कई पशु रात में घबराकर भाग जाते हैं या बीमार पड़ जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों और क्रेशर संचालकों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि रात के समय ड्रोन निगरानी से अवैध गतिविधियों को आसानी से पकड़ा जा सकता है। लेकिन अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है। इस बीच,(झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) और (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) दोनों पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उनकी मॉनिटरिंग सिस्टम इतने बड़े पैमाने पर चल रही गतिविधियों को क्यों नहीं रोक पा रहा। ग्रामीणों ने यह भी पूछा कि जब पर्यावरण संरक्षण की बात आती है तो प्रशासन सिर्फ औपचारिकता क्यों निभाता है? कई ग्रामीणों ने सूचना का अधिकार के माध्यम से जानकारी मांगने की तैयारी शुरू कर दी है, ताकि यह पता चल सके कि प्रशासन ने पिछले 6 महीनों में कितनी कार्रवाई की और कौनसे क्रेशर अधिकृत हैं और कौनसे अवैध।

गांव के बुजुर्गों ने बताया कि पहले इन क्षेत्रों में स्वच्छ हवा और शांत वातावरण था, लेकिन अब हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

महिलाओं ने कहा कि रातभर मशीनों की आवाज़ और ट्रकों के शोर से बच्चों की नींद खराब हो जाती है, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति प्रभावित हो रही है।

लोगों ने यह भी शिकायत की है कि रात के समय उड़ने वाली धूल घरों के अंदर तक घुस जाती है और सुबह उठते ही पूरा घर धूल से ढका होता है।

ऐसा भी आरोप लगाया गया कि कई क्रेशरों द्वारा पानी का छिड़काव नहीं किया जाता, जो कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए अनिवार्य है।ग्रामीणों ने यह भी कहा कि यदि वे मोबाइल से वीडियो बनाकर सबूत इकट्ठा करते हैं तो उन्हें धमकाया जाता है। कई बार रात में बिजली को भी अवैध रूप से हुकिंग कर मशीनें चलाई जाती हैं। वाहनों का इतना ज्यादा दबाव है कि मुख्य सड़कें गड्ढों से भर चुकी हैं और बारिश के समय इन पर चलना मुश्किल हो जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अवैध क्रेशरों पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में यह पूरा इलाका स्वास्थ्य संकट की चपेट में आ सकता है। कुछ स्थानीय नेताओं ने भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और कहा कि इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की जरूरत है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि जिला प्रशासन तुरंत रात में पेट्रोलिंग बढ़ाए, क्रेशरों की कागज़ी जांच करे और बिना पर्यावरण मंजूरी वाले क्रेशरों को तत्काल सील करे। हालांकि, प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लोगों का कहना है कि प्रशासन की चुप्पी से ऐसा लगता है जैसे सभी कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा हो।

महेशपुर और हिरणपुर प्रखंड के सामाजिक संगठनों ने घोषणा की है कि यदि अगले कुछ दिनों में कार्रवाई नहीं होती है, तो वे सामूहिक रूप से धरना-प्रदर्शन करेंगे। स्थानीय युवाओं ने भी आंदोलन की चेतावनी दी है और कहा है कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाएंगे। ग्रामीणों ने कहा कि वे अब चुप नहीं बैठेंगे और आवश्यक हो तो हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगे। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सबकी नजर प्रशासन पर है कि क्या वह इस बार सख्त कदम उठाएगा या फिर पहले की तरह मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।


क्या कहते है पदाधिकारी


जब इस मामले की सूचना  पाकुड़ डीएमओ राजेश कुमार को दिया गया तो उन्होंने कहा कि मामले की जांच के कारवाई किया जाएगा।

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