पाकुड़ का 'लॉटरी लोकतन्त्र': जहाँ कानून की लाठी से ज्यादा माफिया के नंबरों का खौफ है!


जागता झारखण्ड पाकुड़ ममता जयसवाल:
नगर थाना क्षेत्र इन दिनों एक ऐसे 'आधुनिक कुरुक्षेत्र' में तब्दील हो गया है, जहाँ नैतिकता और कानून की हर दिन सरेआम बलि दी जा रही है। इलाके की हवाओं में अब विकास की खुशबू कम और अवैध लॉटरी के टिकटों की सरसराहट ज्यादा सुनाई देती है। इन 'स्वयंभू भाग्य विधाताओं' ने नगर थाना क्षेत्र की सीमाओं के भीतर अपना एक ऐसा समानांतर और अभेद्य किला खड़ा कर लिया है, जिसके आगे सरकारी तंत्र नतमस्तक जान पड़ता है। हैरानी की बात यह है कि जब पूरा शहर इन सफेदपोश ठगों की कारगुजारियों से कराह रहा है और हर गली-कूचे में इस अवैध धंधे की गूंज है, तब हमारा सुरक्षा तंत्र संभवतः किसी ऐसी 'दिव्य निद्रा' में लीन है जिसे जगाने का साहस खुद कानून भी नहीं कर पा रहा। यहाँ की सड़कों पर अब भविष्य की योजनाएं नहीं, बल्कि उन जादुई नंबरों की बोलियां लगती हैं जो गरीब की थाली से रोटी छीनकर माफिया की तिजोरी में सोना भरने का काम करती हैं। चर्चाओं के बाजार में यह बात भी पूरी शिद्दत से तैर रही है कि इस काले साम्राज्य को कुछ 'माननीयों' का वरदहस्त प्राप्त है, जिनकी मौन स्वीकृति ने इन जुआरियों के हौसलों को हिमालय जैसी ऊँचाई दे दी है। यह महज एक अवैध धंधा नहीं, बल्कि एक सामाजिक कैंसर बन चुका है जो धीरे-धीरे पाकुड़ की युवा पीढ़ी की रगों में जहर घोल रहा है। युवा वर्ग अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई और सुनहरे सपनों को इन रंगीन कागज के टुकड़ों पर स्वाहा कर रहा है, जिससे अनगिनत परिवार आर्थिक तबाही के मुहाने पर खड़े हो गए हैं। वहीं दूसरी ओर, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के दफ्तर से निकलने वाला वह 'शाश्वत बयान' आज भी फिजाओं में गूंज रहा है कि "जांच चल रही है और किसी को बख्शा नहीं जाएगा।" यह आश्वासन अब जनता के कानों में किसी पुराने ग्रामोफोन की घिसी हुई रिकॉर्डिंग की तरह चुभने लगा है, क्योंकि धरातल पर माफिया की 'लॉटरी एक्सप्रेस' बिना किसी रेड सिग्नल के सरपट दौड़ रही है। नगर थाना क्षेत्र की जनता अब जिला प्रशासन की उस 'निष्पक्षता' पर सवाल उठा रही है जो केवल फाइलों के पन्नों तक सीमित रह गई है। क्या वाकई हमारा खुफिया तंत्र इतना पंगु हो गया है कि उसे अपनी नाक के नीचे चलता यह महासंगठित अपराध दिखाई नहीं देता, या फिर 'ऊपर तक' प्रसाद पहुँचाने की परंपरा ने सबकी आँखों पर मोतियाबिंद की चादर चढ़ा दी है? जिस तेजी से यह अवैध कारोबार अपनी जड़ें जमा रहा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि यहाँ रक्षक और भक्षक के बीच का अंतर धुंधला पड़ चुका है। नागरिकों ने अब सीधे तौर पर जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि वह अपने 'गांधारी अवतार' का त्याग करे और इन अदृश्य शक्तियों के खिलाफ कोई ठोस और सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई सुनिश्चित करे। अगर अब भी इस जुए के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब पाकुड़ की पहचान केवल इस अवैध धंधे से होगी और आने वाली नस्लें व्यवस्था की इस विफलता के लिए वर्तमान हुक्मरानों को कभी माफ नहीं करेंगी।

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