अहमद समीर बीए और एमए इन मीडिया एंड गवर्नेस, जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली नया साल सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह उन उम्मीदों की दस्तक है, जो बीते साल रोज़मर्रा की जद्दोजहद में कहीं दब गई थीं, और उन सवालों की भी, जिनके जवाब अब भी अधूरे हैं। झारखंड के लिए नया साल हर बार एक नई आस लेकर आता है। झारखंड की पहचान केवल उसकी खनिज संपदा से नहीं है। इसकी असली पहचान यहाँ के आदिवासी समाज, उनकी लोकसंस्कृति, भाषाएँ और लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष हैं। नया साल इन पहचानों को बचाने और उन्हें विकास की मुख्यधारा में सम्मान के साथ स्थान देने का अवसर भी है। बीते साल कई मायनों में चुनौतियों और प्रयासों का रहा। राज्य सरकार की ओर से सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सोशल सिक्योरिटी योजनाओं, छात्रवृत्ति, और स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं ने बड़ी आबादी को राहत पहुँचाई है। गांवों में राशन की नियमित उपलब्धता और गरीब परिवारों तक सरकारी योजनाओं की पहुँच ने यह भरोसा जगाया है कि शासन व्यवस्था धीरे-धीरे ज़मीनी ज़रूरतों को समझ रही है।
हालांकि झारखंड का किसान आज भी बारिश, बाज़ार और नीति—तीनों से जूझ रहा है। बावजूद इसके, कृषि सहायता योजनाओं, बीज और सिंचाई से जुड़ी पहलों ने कई इलाकों में किसानों को सहारा दिया है। नया साल तब और सार्थक होगा, जब मेहनत करने वाले हाथों को उनकी उपज का सही दाम मिले और युवाओं को रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन न करना पड़े। यह राहत की बात है कि सरकार स्थानीय रोज़गार, स्किल डेवलपमेंट और स्वरोज़गार योजनाओं पर ज़ोर दे रही है, लेकिन इनका असर ज़मीन पर और मज़बूती से दिखना अभी बाकी है। विकास की बात करते हुए यह भी ज़रूरी है कि जल, जंगल और ज़मीन को नज़रअंदाज़ न किया जाए। आदिवासी समाज के लिए ये सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। नई नीतियों में वन अधिकार, स्थानीय सहमति और पर्यावरण संतुलन को जगह देना एक सकारात्मक संकेत है। यदि विकास और परंपरा के बीच संतुलन बना रहा, तो यही झारखंड की असली जीत होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी धीरे-धीरे सुधार दिखाई दे रहा है। दूरदराज़ के इलाकों में स्कूलों का विस्तार, छात्राओं के लिए प्रोत्साहन योजनाएँ और सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का बढ़ना उम्मीद जगाता है। हालांकि आज भी युवाओं में बेरोजगारी झारखंड के लिए एक अहम चुनौती है। नया साल तभी सच में नया कहलाएगा, जब बच्चों के हाथों में किताबें हों और बीमार को समय पर इलाज मिले। लोगों को उसका हक मिले, बेरोजगारों को रोजगार मिले।
सरहुल, करमा और सोहराय जैसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि झारखंड की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है। राज्य सरकार द्वारा स्थानीय पर्वों, भाषाओं और आदिवासी कला-संस्कृति को बढ़ावा देना एक सराहनीय कदम है।
आख़िरकार, नया साल झारखंड के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक मौका है-गलतियों से सीखने का,हाशिए पर खड़े लोगों को केंद्र में लाने का,और वादों से आगे बढ़कर काम करने का। उम्मीद है कि यह नया साल झारखंड के लिए संघर्ष से समाधान, और उम्मीद से हक़ की ओर बढ़ने वाला साल बने—जहाँ विकास सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी में महसूस हो।
नया साल, झारखंड और उम्मीदों की नई सुबह
Jagta jharkhand
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