झारखंड में मॉब लिंचिंग: नफरत के खिलाफ अधूरा कानून और इंसाफ की पुकार

 


अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस पर विशेष रिपोर्ट रांची।झारखंड, जिसे कभी गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल के रूप में जाना जाता था, बीते कुछ वर्षों में नफरत, अफवाह और भीड़तंत्र की राजनीति का शिकार बनता गया है। राज्य में लगातार सामने आई मॉब लिंचिंग की घटनाओं ने न सिर्फ मानवाधिकारों को कुचला है, बल्कि संविधान और कानून के राज पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में अब तक लगभग 50 निर्दोष लोगों की जान मॉब लिंचिंग की हिंसा में जा चुकी है। यह घटनाएं किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि पूरे समाज को झकझोरने वाली सच्चाई बनकर सामने आई हैं।

2016 से शुरू हुआ नफरत का सिलसिला

मॉब लिंचिंग की भयावह शुरुआत वर्ष 2016 में लातेहार जिले के बालूमाथ थाना क्षेत्र अंतर्गत झाबर गांव से हुई, जहां पशु व्यापारी मजलूम अंसारी और 12 वर्षीय इम्तियाज खान को पीट-पीटकर पेड़ से लटका दिया गया। यह घटना कानून व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी थी, लेकिन इसके बाद हिंसा का सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता चला गया। रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी, गोड्डा में चिराग उद्दीन अंसारी और मुर्तजा अंसारी, जमशेदपुर में बच्चा चोरी की अफवाह पर शेख नईम, शेख हलीम, मोहम्मद सज्जाद और सिराज खान, रांची के अनगड़ा में मुबारक खान, गुमला में एजाज खान, बोकारो नई बस्ती में मुबारक अंसारी, कोडरमा में मौलाना साहब उद्दीन अंसारी, रांची के काटम कुल्ली में अख्तर अंसारी—ये सभी भीड़ की हिंसा का शिकार बने।

 तबरेज अंसारी मामला बना देशव्यापी चेतावनी

खरसावां में तबरेज अंसारी की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। चोरी के आरोप में पकड़े गए तबरेज को घंटों पीटा गया, धार्मिक नारे लगवाए गए और इलाज के अभाव में उनकी मौत हो गई। यह घटना दर्शाती है कि किस तरह भीड़ खुद को कानून से ऊपर समझने लगी थी।

हिंसा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि मॉब लिंचिंग की हिंसा केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रही। गढ़वा में आदिवासी रमेश मिंज, गुमला में प्रकाश लकड़ा, खूंटी में केलमन्तुस बारला, वहीं जमशेदपुर में एक हिन्दू वर्मा परिवार के दो भाई, उनके मित्र गंगेश गुप्ता और बुजुर्ग दादी रामवती देवी भी भीड़ की हिंसा का शिकार बने। इससे यह साफ होता है कि यह हिंसा किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे समाज और संविधान के खिलाफ है।

कानून बना, लेकिन लागू नहीं हो सका

मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पहल पर झारखंड सरकार ने एक सख्त मॉब लिंचिंग विरोधी कानून तैयार किया, जिसे विधानसभा से पारित भी किया गया। हालांकि, यह कानून राज्यपाल स्तर पर “कुछ सुधार” के नाम पर वापस कर दिया गया। वर्ष 2022 में पुनः भेजे जाने के बावजूद यह कानून आज तक अधर में लटका हुआ है।

 सरकार से कानून को तत्काल लागू करने की मांग

अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस के अवसर पर यूनाइटेड मिल्ली फोरम ने झारखंड सरकार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग की है कि मॉब लिंचिंग विरोधी कानून को अविलंब पुनः राज्यपाल के पास भेजकर इसे लागू कराया जाए।

फोरम का कहना है कि यह कानून केवल अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे समाज को भीड़तंत्र से बचाने की संवैधानिक जिम्मेदारी है। जब तक सख्त कानून, त्वरित न्याय और दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक नफरत फैलाने वाली ताकतें बेखौफ बनी रहेंगी।

नफरत नहीं, इंसाफ चाहिए

झारखंड को आज नफरत की नहीं, इंसाफ और कानून के राज की जरूरत है। यही अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस का सच्चा संदेश भी है।

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