प्रतिनिधि: जागता झारखंड, कटिहार (बिहार) कटिहार: बिहार की राजनीति में अहम स्थान रखने वाला कटिहार जिला कांग्रेस वर्तमान में एक अत्यंत विचित्र और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पार्टी के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और सांगठनिक प्रयोगों ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसने पार्टी की पुरानी परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है। हालांकि, प्रदेश नेतृत्व का यह तर्क है कि जिले में दो जिला अध्यक्ष (शहरी और ग्रामीण) मनोनीत करने से संगठन को मजबूती मिलेगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। जानकारों का कहना है कि जो सांगठनिक शक्ति एक 'अखंड धारा' के रूप में ताकतवर होती, वह दो हिस्सों में बंटकर अपनी धमक खो चुकी है। सिद्धांत यह है कि शक्ति जब एक धारा में बहती है तो उसका वेग प्रचंड होता है, लेकिन दो धाराओं में बंटते ही वह शक्ति और प्रभाव पूरी तरह से क्षीण हो गया है, जिससे संगठन मजबूत होने के बजाय अंदर से खोखला हो रहा है।
संगठन के भीतर मची इस उथल-पुथल की एक बड़ी वजह दूसरे दलों से आए और उन्हीं की अवसरवादी मानसिकता रखने वाले व्यक्तियों को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देना है। विडंबना यह है कि जिन्हें जिला कमेटी में ऊंचे पदों से सुशोभित किया गया है, वे अब वर्षों से कांग्रेस को अपने खून-पसीने से सींचने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं को 'फ्यूज बल्ब' कहकर अपमानित कर रहे हैं। राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा बड़े ही तीखे और आक्रामक लहजे में हो रही है कि पुराने कार्यकर्ताओं को 'फ्यूज बल्ब' कहने वाले इन लोगों के तो खुद के घर में कभी 'बिजली का कनेक्शन' तक नहीं रहा है, यानी इनका अपना न कोई जनाधार है और न ही कोई राजनैतिक वजूद। हद तो तब हो गई जब यह देखा गया कि इन पदों पर बैठे कुछ लोगों ने विगत विधानसभा चुनाव में पार्टी के पदाधिकारी रहते हुए भी दूसरे दलों के हित में काम किया, जिससे समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच भारी आक्रोश व्याप्त है।इसी अशांत परिवेश, बिखराव और वैचारिक संकट के बीच, कटिहार के सांसद तारिक अनवर ने एक अत्यंत सराहनीय और सुधारात्मक कदम उठाया है। उन्होंने कांग्रेस के पूर्व जिला अध्यक्ष सुनील यादव को अपना सांसद प्रतिनिधि मनोनीत किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुनील यादव की यह नियुक्ति उनके जिला अध्यक्ष काल के दौरान की अटूट निष्ठा, एकाग्रता और पार्टी के प्रति समर्पण को देखते हुए ली गई है। विश्लेषकों के अनुसार, सांसद महोदय का यह 'पारखी' निर्णय संगठन के भीतर चल रही उथल-पुथल को शांत करने और पार्टी के 'स्वस्थ रूप' को पुनः बहाल करने की एक गंभीर प्रक्रिया है। अब देखना यह है कि सांसद के इस निर्णय से आने वाले दिनों में संगठन कितना मजबूत हो पाता है।


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