पाकुड़ में नियमों को रौंदती कोयले की मालगाड़ियां: पटरियों पर बिखरा सिस्टम और प्रशासन की मौन सहमति पर उठते गंभीर सवाल

 जागता झारखंड संवाददाता पाकुड़ 


: अगर आप पाकुड़ रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं और अचानक आपको काले बादलों का अहसास होने लगे, तो खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह कोई सुखद मानसून नहीं, बल्कि नियमों को ठेंगे पर रखकर दौड़ती कोयला लदी मालगाड़ियों का 'आशीर्वाद' है। जिले में इन दिनों ओवरलोडिंग और लापरवाही का ऐसा नंगा नाच चल रहा है कि रेलवे की पटरियां तो क्या, अब आम आदमी का दम भी घुटने लगा है। नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोयले की ढुलाई के दौरान वैगनों को तिरपाल से ढकना अनिवार्य है, लेकिन पाकुड़ में ये नियम शायद सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के काम आ रहे हैं। यहाँ दर्जनों वैगन बिना तिरपाल के 'सीना तानकर' इस कदर गुजर रहे हैं, मानो ठेकेदार खुलेआम प्रशासन को चुनौती दे रहे हों कि धूल उड़ाना हमारा काम है और सहना जनता का। कोयले का यह गुबार न केवल पर्यावरण को बुरी तरह डस रहा है, बल्कि प्लेटफॉर्म पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे मासूम यात्रियों को फेफड़ों की बीमारी मुफ्त में बांट रहा है। रेलवे प्लेटफॉर्म का नजारा तो अब किसी रेलवे स्टेशन जैसा कम और कोयला खदान जैसा अधिक लगने लगा है, जहाँ से जब भी कोई मालगाड़ी गुजरती है, वह पीछे कोयले के बड़े-बड़े टुकड़े और कालिख का अंबार छोड़ जाती है। स्थिति की विडंबना देखिए कि बेबस सफाईकर्मी दिन भर झाड़ू घिसते रहते हैं, मगर रसूखदारों द्वारा फैलाई गई इस सिस्टम की गंदगी साफ होने का नाम नहीं ले रही। यात्रियों के लिए प्लेटफॉर्म पर दो पल खड़ा होना दूभर हो गया है, लेकिन साहबों की वातानुकूलित बोगियों और दफ्तरों के बंद दरवाजों तक जनता की यह धूल और चीखें शायद पहुंच ही नहीं पा रही हैं। जब भी इस भयावह स्थिति पर सवाल पूछा जाता है, तो जिम्मेदारी का एक भद्दा खेल शुरू हो जाता है, जहाँ रेलवे प्रशासन लोडिंग की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है और खनन विभाग अपनी फाइलों के मकड़जाल में उलझा नजर आता है, वहीं दूसरी ओर ठेकेदार मुनाफे की चादर ओढ़कर चैन की नींद सो रहे हैं। आखिर पाकुड़ की जनता इस काले धुएं और उड़ती कालिख की सजा क्यों भुगते और प्रशासन किस बड़े हादसे या जन-आंदोलन का इंतजार कर रहा है? आज यह सीधा और तीखा सवाल पाकुड़ के प्रशासनिक महकमे पर खड़ा है कि क्या तंत्र इतना लाचार हो चुका है कि चंद ठेकेदारों के निजी मुनाफे के आगे जनता की सेहत और सरकारी नियमों की बलि दी जा रही है। अगर इस बेलगाम ओवरलोडिंग और लापरवाही पर तुरंत नकेल नहीं कसी गई, तो यह मान लिया जाएगा कि पटरियों पर कोयला नहीं, बल्कि इस लोकतंत्र में आम आदमी का बचा-कुचा विश्वास राख हो रहा है। प्रशासन को अब गहरी नींद से जागकर इन दोषियों पर ऐसी सख्त कार्रवाई करनी होगी जो नजीर बने, वरना यह कालिख पूरे तंत्र के चेहरे पर पुतनी तय है।

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