खिजुरिया में गूंजा हरिनाम, भागवत कथा के चतुर्थ दिवस श्रद्धालु भाव-विभोर

 


जागता झारखंड संवाददाता संजय गोस्वामी फतेहपुर जामताड़ा  : फतेहपुर प्रखंड के खिजुरिया ग्राम स्थित बजरंगबली मंदिर का प्रांगण इन दिनों आध्यात्मिक आभा से आलोकित है। यहां आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस श्रद्धा, विश्वास एवं भक्ति का अनुपम संगम दृष्टिगोचर हुआ। वृंदावन धाम से पधारे बाल व्यास पंडित नीतीश कृष्ण शास्त्री ने अपने श्रीमुख से प्रस्फुटित अमृतमयी वाणी द्वारा श्रद्धालुओं के अंत:करण को भाव-विभोर कर दिया। अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन यद्यपि क्षणभंगुर है, तथापि अत्यंत अमूल्य है। दैनिक जीवन में अनजाने में संपन्न पापों का प्रायश्चित केवल ईश्वर की शरणागति से ही संभव है। आत्मशुद्धि का पथ भक्ति, सत्संग एवं सत्कर्मों से होकर ही प्रशस्त होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा-अर्चना तभी फलदायी होती है, जब उसके साथ आचरण की पवित्रता तथा विचारों की निर्मलता भी समन्वित हो। कथा प्रसंग में कपिल, सती, ध्रुव तथा जड़ भरत के प्रेरणादायक चरित्रों का मार्मिक वर्णन किया गया। कथा के क्रम में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ भजन की स्वर-लहरियों पर श्रद्धालु दीर्घ समय तक झूमते रहे। इस अवसर पर कथा-पंडाल को पुष्पमालाओं एवं गुब्बारों से सुसज्जित किया गया था। कथावाचक ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का विवेचन करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन पुरुषार्थों की महत्ता प्रतिपादित की।उन्होंने कहा कि जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार, अनाचार एवं अन्याय की वृद्धि हुई है, तब-तब भगवान ने विविध अवतार धारण कर धर्म की पुनर्स्थापना की है। मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के दुष्कृत्यों से व्यथित पृथ्वी की करुण पुकार पर नारायण ने देवकी के अष्टम पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण अवतार ग्रहण किया तथा कंस का वध कर धर्म और प्रजा की रक्षा की। कथा के दौरान वासुदेव, यशोदा एवं बालकृष्ण की मनोहर झांकी प्रस्तुत होते ही समूचा पंडाल ‘जय श्रीकृष्ण’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। कथावाचक ने कहा कि भागवत कथा का श्रवण करना परम सौभाग्य का विषय है। जब भी यह सुअवसर प्राप्त हो, उसका समुचित लाभ उठाना चाहिए। कथा-श्रवण तभी सार्थक है, जब मनुष्य उसके उपदेशों को जीवन में आत्मसात कर परमार्थ के पथ पर अग्रसर हो। उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों का स्मरण कराते हुए कहा कि प्रभु ने राक्षसी शक्तियों से पृथ्वी को मुक्त करने हेतु अवतार धारण किया। नृसिंह एवं वाराह अवतार की महिमा का गूढ़ विवेचन करते हुए उन्होंने बताया कि प्रभु-नाम ही भवसागर से पार होने की नौका है। क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का परित्याग कर ही मनुष्य वैराग्य-पथ पर अग्रसर हो सकता है। वास्तविक वैराग्य संसार से पलायन नहीं, अपितु उसमें स्थित रहकर भी आसक्ति से मुक्त रहने का नाम है।भजन-मंडली द्वारा प्रस्तुत ‘हरि-नाम’ संकीर्तन की मधुर ध्वनि से समूचा परिसर भक्तिरस में सराबोर हो उठा। ग्राम सहित समीपवर्ती क्षेत्रों से बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर होकर कथा-रस का पान कर रहे हैं। आयोजन को लेकर क्षेत्र में विशेष उत्साह व्याप्त है।

Post a Comment

और नया पुराने