बांस के अस्थायी पुल से गुजरने को मजबूर ग्रामीण
जागता झारखंड संवाददाता बजरंग कुमार महतो घाघरा गुमला : गुमला जिला के घाघरा प्रखंड से मात्र 13 किलोमीटर दूर आदर पंचायत के घने जंगलों के बीच बसा ताबील गांव आजादी के 75 वर्ष बाद भी विकास की रोशनी से कोसों दूर है। यहां के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं। सड़क, पुल, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी मूलभूत जरूरतें आज भी इस गांव के लिए सपना बनी हुई हैं।
बरसात में प्रखंड मुख्यालय से कट जाता है संपर्क
गांव तक पक्की सड़क न होने से ग्रामीणों को आवागमन में भारी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है, जब नदी-नाले उफान पर होते हैं और खेतों में पानी भर जाता है। ऐसे में गांव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चे बरसात के दिनों में पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं, जबकि बीमारों और गर्भवती महिलाओं को कंधों पर लादकर करीब तीन किलोमीटर दूर मलगो मुख्य पथ तक ले जाना पड़ता है।
नदी पार करना बना ग्रामीणों के लिए जोखिम, प्रशासन नींद में
गांव में प्रवेश से पहले नदी पर पुल न होने से ग्रामीण बांस का अस्थाई पुल बनाकर पार करते हैं। यह पुल कभी भी ढह सकता है, खासकर बरसात में जहां खतरा दोगुना हो जाता है। 300 ग्रामीण इसी पुल पर निर्भर हैं ।ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
सोलर प्लांट मात्र सरकारी दिखावा, रातें अंधेरे में गुजारने को मजबूर
गांव में सरकारी बिजली आपूर्ति अभी तक नहीं पहुंची। 17 नवंबर 2025 को सोलर प्लांट लगाकर घर-घर कनेक्शन दिए गए, लेकिन यह व्यवस्था बेकार साबित हुई। रात में महज एक-डेढ़ घंटे बल्ब जल पाता है, फिर गांव अंधेरे में डूब जाता है। इससे न बच्चों की पढ़ाई हो पा रही है, न सिंचाई के लिए मोटर चल पाती। ग्रामीण अन्य गांवों की तरह स्थायी सरकारी बिजली चाहते हैं।
आंगनबाड़ी केंद्र का अभाव, कुपोषण की चपेट में बच्चे-महिलाएं
300 आबादी वाले इस गांव में आंगनबाड़ी केंद्र न होने से महिलाएं व बच्चे पोषण योजनाओं से वंचित हैं। दूसरे गांव से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कभी-कभार आती हैं, लेकिन नियमित व्यवस्था न होने से गर्भवती महिलाओं व बच्चों को कुछ नहीं मिलता।
नक्सली मुक्त होने के बाद भी विकास से वंचित ताबिल गांव
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क, पुल और बिजली जैसे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यह गांव लंबे समय तक नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना रहा । अब क्षेत्र नक्सली मुक्त है लेकिन विकास अब भी गांव की चौखट तक नहीं पहुंच पाया ।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर सवाल: कब जागेगी सरकार?
स्थानीय ग्रामीण पूछ रहे हैं कि प्रखंड प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सरकार कब ताबील गांव की सुध लेंगे? न स्कूल, न आंगनबाड़ी, न सड़क, न पुल, न बिजली, न स्वास्थ्य सुविधा—यह गांव सरकारी योजनाओं से बाहर है। क्या आजादी का अमृत महोत्सव सिर्फ शहरों तक सीमित रहेगा?
आप पहले व्यक्ति हैं जो हमारी समस्याओं को सुनने आए - बुजुर्ग विलास टोपनो
जब जागता झारखंड अख़बार के संवाददाता ताबिल गांव पहुंचे, तो उन्हें देखकर ग्रामीणों में उत्साह की लहर दौड़ गई। वर्षों से उपेक्षित गांव में किसी अख़बार प्रतिनिधि का पहुंचना ग्रामीणों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया।
इस दौरान गांव के 75 वर्षीय बुजुर्ग विलास टोपनो भावुक होकर संवाददाता के पास पहुंचे और कहा कि आज तक हमारे गांव में कोई भी अख़बार का प्रतिनिधि हमारी समस्याओं को देखने और सुनने नहीं आया। आप पहले व्यक्ति हैं जो हम लोगों के बीच आए हैं।




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