जागता झारखंड डॉ. अशरफ़ अली : यह शोक, यह सन्नाटा, ये सिसकियाँ—किसी सामान्य व्यक्ति की विदाई पर नहीं हैं बल्कि एक ऐसे युग के अवसान पर हैं जिसने जनसेवा, राजनीतिक ईमानदारी और मानवीय करुणा की एक नई परिभाषा गढ़ी। वे, जिनके संघर्ष ने वंचितों को स्वर दिया, जिनका व्यक्तित्व आशा का दीप था - आज वे हमारे बीच नहीं रहे।
इतिहास में कुछ नाम केवल व्यक्ति की पहचान नहीं रहते परन्तु वे एक विचार, एक आंदोलन बन जाते हैं। शिबू सोरेन उन्हीं युगप्रवर्तक चरित्रों में से एक थे। आदिवासियों की पहचान, आत्मसम्मान और स्वायत्तता के लिए जो लड़ाई उन्होंने लड़ी, वह एक युग का दस्तावेज़ बन चुकी है। उनका जीवन अभावों से अधिकारों तक और सत्ता से सामाजिक न्याय तक की यात्रा का जीवंत प्रमाण है।
11 जनवरी 1944 को झारखंड (तत्कालीन बिहार) के रामगढ़ ज़िले के नेमरा गाँव में जन्मे शिबू सोरेन ने बाल्यकाल से ही गरीबी, शोषण और अन्याय को न केवल देखा बल्कि उसे जिया, सहा और महसूस किया। 1972 में जब उनके पिता, शोबराम सोरेन, ज़मींदारों की बर्बरता के शिकार बने तो यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी बल्कि उनके भीतर प्रतिरोध, विद्रोह और संघर्ष की जो चिनगारी सुलगी, वह बाद में एक युगांतरकारी आंदोलन में परिणत हो गई। यही क्षण उनके क्रांतिकारी जीवन का आरंभ और झारखंड के स्वप्न की पहली सीढ़ी सिद्ध हुआ। और इस तरह 23 जनवरी 1975 का दिन झारखंड की राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया, जब शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी—एक ऐसा आंदोलन जो मौन लोगों की वाणी, वंचितों की आवाज़ और शोषित वर्गों की आशा बनकर उभरा। उनकी निर्भीक नेतृत्व क्षमता ने इसे मात्र एक राजनीतिक दल नहीं रहने दिया बल्कि यह एक जनक्रांति में परिवर्तित हो गया।
शिबू सोरेन ने जंगल, ज़मीन और संसाधनों पर स्थानीय निवासियों के स्वामित्व के अधिकार के लिए वे संघर्ष किए, जिनमें गिरफ्तारी की ज़ंजीरें, मुकदमों की धमकियाँ और सत्ता की साज़िशें भी उनके संकल्प को डगमगाने नहीं दे सकीं। हर मोड़ पर उन्होंने जनता का विश्वास, स्नेह और अडिग निष्ठा अर्जित की और यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी।
राजनीतिक सेवाएँ:
शिबू सोरेन की सियासी यात्रा उनकी जनप्रियता और राजनीतिक दूरदृष्टि का जीवंत प्रमाण है। 1980 से 2009 के बीच उन्होंने आठ बार दुमका की जनता का विश्वास अर्जित करते हुए लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व किया जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। केंद्र में वे कोयला एवं खनन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे, जहाँ उन्होंने संसाधनों की लूट और शोषण के विरुद्ध प्रभावशाली ढंग से आवाज़ उठाई।
वर्ष 2020 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और उच्च सदन में झारखंड के मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर मजबूती से प्रस्तुत करते रहे। तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद को सुशोभित करना उनकी संगठनात्मक दक्षता, जनभावनाओं से निकटता और निष्कलंक नेतृत्व का उज्ज्वल प्रमाण है - एक ऐसी उपलब्धि, जो केवल राजनेताओं को नहीं बल्कि जनता के सच्चे सेवकों को ही प्राप्त होती है।
निधन, शोक और एक युग का अवसान:
4 अगस्त 2025 को जब शिबू सोरेन ने दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम साँस ली तो ऐसा लगा जैसे एक सदी मौन हो गई, एक आंदोलन थम गया और एक युग अपने अंत को पहुँचा। यह समाचार पलों में पूरे झारखंड में इस तरह फैल गया मानो कोई पवित्र वटवृक्ष जड़ से कट गया हो। हर गाँव का वातावरण शोकग्रस्त, हर चेहरा म्लान और हर हृदय विदीर्ण हो गया। उनके अनुयायी, कार्यकर्ता, युवा, मज़दूर, किसान—सभी जैसे अपने आत्मिक संरक्षक से वंचित हो गए हों। कहीं आँखों से आँसुओं की धार बही, कहीं चूल्हे बुझ गए और होंठों पर केवल कांपती हुई दुआएँ रह गईं۔
यह क्षति केवल झारखंड की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है। शिबू सोरेन उन विरले नेताओं में से थे जिन्होंने सत्ता को कभी निजी वैभव का साधन नहीं बनाया बल्कि जनता की आशाओं, पीड़ाओं और स्वप्नों को साकार करने का माध्यम बनाया। उनका सरल जीवन, निष्कलंक राजनीति और जनसेवा का अदम्य भाव भावी पीढ़ियों के लिए एक आदर्श, एक प्रेरणा और एक दिशा है। उनके निधन से जो रिक्तता उत्पन्न हुई है वह केवल एक पद की नहीं बल्कि उस विश्वास, उस नैतिक बल, और उस जन-संवाद की है जिसका विकल्प शायद दशकों तक खोजे नहीं मिलेगा।
शिबू सोरेन केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, वे स्वयं में एक सजीव आंदोलन, एक जीवंत प्रतीक और शोषित–वंचित वर्गों की सदियों पुरानी संघर्षगाथा के मुखर प्रवक्ता थे। उनके व्यक्तित्व में वह सरलता थी जो मिट्टी की सौंध से जन्म लेती है, वह अडिगता थी जो तूफ़ानों से टकरा कर भी अपनी दिशा नहीं बदलती और वह निर्भीकता थी जो सत्य को निर्भय होकर कहने का साहस रखती है।
उनकी वाणी में गाँव के खलिहानों की गंध, जंगलों की मौन सच्चाई और मज़दूरों के पसीने से भीगी भाषा गूंजती थी। उनकी भाषणों को लिखा नहीं जाता था बल्कि वे जन–पीड़ा से स्वयं फूट पड़ते थे। सत्ता उनके लिए कभी विलासिता नहीं, सदैव एक परीक्षा रही और कैद ने उनके जज़्बे को कुंद करने के बजाय और भी निखार दिया। उनका जीवन का हर क्षण झारखंड को समर्पित था। जब वे बोलते तो उसमें आदिवासियों के घावों की गूंज होती और जब वे मौन रहते तो उस मौन में भी एक आक्रोश छिपा होता। भौतिक रूप से वे जहाँ भी रहें उनका हृदय सदैव जंगलों, पहाड़ों और खेतों के मध्य धड़कता रहा।
शिबू सोरेन , यह केवल एक नाम नहीं बल्कि एक ऐसा पर्याय है जो राजनीति की शब्दावली में ईमानदारी और बलिदान का प्रतीक बन चुका है और जन–संघर्ष के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जिसे समय की कोई भी शक्ति फरामूश नहीं कर सकती।
राजनीतिक विरासत और हेमंत सोरेन:
शिबू सोरेन के आंदोलन की विरासत आज भी उनके पुत्र हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जीवंत है। वे केवल एक पुत्र के रूप में नहीं बल्कि एक जागरूक और दूरदर्शी नेता के रूप में सामने आए हैं। झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री होने के नाते, उनके कंधों पर शासन की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ अपने पिता के संघर्ष, दृष्टिकोण और बलिदानों की रक्षा का दायित्व भी है।
पिछले कई वर्षों में हेमंत सोरेन ने राज्य के बुनियादी मुद्दों—रोज़गार, शिक्षा, आदिवासी अधिकार, भूमि संरक्षण और महिलाओं की स्वायत्तता पर उल्लेखनीय कार्य किया है। उनकी नीतियों में वही जन–पीड़ा, वही पारदर्शिता और वही दृष्टिवान नेतृत्व झलकता है जो शिबू सोरेन के स्वभाव की पहचान थी।
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि वे केवल एक राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं हैं बल्कि अपने पिता की विचारधारा और संघर्ष के सच्चे वारिस हैं। उन्होंने न केवल अपने पिता की छवि को आत्मसात किया है बल्कि यह भी दिखाया है कि वे उनके विचारों के मात्र अनुयायी नहीं बल्कि उन्हें धरातल पर साकार करने वाले एक सक्रिय और विवेकशील नेता हैं।
इस अवसर पर हम हेमंत सोरेन को इस जन–आंदोलन के ध्वजवाहक बनने पर दुख और संवेदना व्यक्त करते हुए हार्दिक शुभकामनाएँ भी देते हैं कि वे भी अपने पिता की भाँति ईमानदारी, पारदर्शिता, जन–कल्याण और राजनीतिक दृढ़ता के साथ झारखंड की सेवा करते रहें। यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पीड़ितों की सदियों पुरानी पुकार है और इसकी सच्चाई ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।इसलिए आप जनता के दुख–दर्द को सदैव महसूस करते रहें,
सत्ता को सेवा का माध्यम बनाएं,
और युवा पीढ़ी को ज्यादा से ज्यादा इस आंदोलन से जोड़ें ताकि यह संघर्षशील दीपक जलता रहे।
और सबसे बढ़कर अपने पिता के नाम और विचारधारा की मर्यादा बनाए रखें क्योंकि:
"शिबू सोरेन भले ही शारीरिक रूप से विदा हो गए हों,
पर उनका चिंतन, उनका स्वप्न और उनका विश्वास अब आपकी ज़िम्मेदारी है और इस स्वप्न को हक़ीक़त में बदल देना ही आपकी सबसे बड़ी सफलता होगी।

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